वैदिक लेख

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 संसार में सत्य और असत्य में अनादि काल से झगड़ा है, तथा अनंत काल तक रहेगा। क्योंकि सत्य सबको समझ में नहीं आता। क्यों? मन शुद्ध न होने से।
         प्रत्येक व्यक्ति कहता है, मैं सच्चा हूं,  सामने वाला व्यक्ति झूठा है। दूसरा व्यक्ति भी यही कहता है, मैं सच्चा हूं, सामने वाला झूठा है. जबकि सत्य एक ही है। फिर भी दोनों उस एक सत्य को समझ नहीं पा रहे। क्यों नहीं समझ पा रहे? इसका कारण है मन की अशुद्धता। 
        जिस व्यक्ति का मन स्वार्थ राग द्वेष काम क्रोध लोभ ईर्ष्या अभिमान पक्षपात आदि दोषों से भरा पड़ा है, वह सत्य को नहीं समझ सकता। इन कारणों से उसे जो सत्य है, वह असत्य के रूप में दिखता है। और जो असत्य है, वह सत्य के रूप में दिखता है। इसलिए उसको वास्तविक सत्य समझ में नहीं आता।  
      परंतु जिस व्यक्ति का मन शुद्ध है, उसमें स्वार्थ राग द्वेष आदि दोष नहीं हैं, बल्कि इनके स्थान पर सेवा परोपकार दान दया नम्रता सभ्यता विद्या आदि उत्तम गुण हैं, उसे सत्य शीघ्र ही समझ में आता है। क्योंकि वहां सत्य का स्वागत करने के लिए उत्तम उत्तम गुण विद्यमान हैं।
       स्वार्थी व्यक्ति के मन में राग द्वेष अविद्या आदि दोषों के कारण सत्य को प्रवेश करने के लिए अवसर ही नहीं मिलता। वे दोष सत्य को प्रवेश करने ही नहीं देते। इसलिए अशुद्ध मन वाले व्यक्ति को सत्य समझ में नहीं आता।
        परंतु इतना तो सभी जानते हैं कि वास्तविक लाभ तो सत्य को धारण करने से ही होता है। इसलिए यदि हम सुख शांति आनंद प्राप्त करना चाहते हैं; दुख मूर्खता लोभ क्रोध राग द्वेष आदि दोषों से बचना चाहते हैं, तो हमें वास्तविक सत्य को समझना ही होगा, और कोई उपाय नहीं है।
       वास्तविक सत्य को समझने के लिए  वेद आदि सत्य शास्त्रों में लिखा है कि मन की शुद्धि होना अनिवार्य है। और मन को शुद्ध करने के लिए निराकार सर्वशक्तिमान् न्यायकारी आनंदस्वरूप ईश्वर की उपासना करना अनिवार्य है। 
          ईश्वर की उपासना करने से, ईश्वर को न्यायाधीश दंडाधिकारी स्वीकार करने से व्यक्ति सारे अपराध बंद कर देता है। जब उसे ईश्वर का न्यायकारी स्वरूप दिखता है, और यह पता चलता है कि "ईश्वर हमारे अपराधों का दंड अवश्य देगा, क्षमा बिल्कुल नहीं करेगा।" तब वह निश्चय करता है कि अब मैं ऐसी गलतियां पाप कर्म आदि दोष नहीं करूंगा। तब ईश्वर उपासना से उसको ज्ञान बल आनंद न्याय आदि गुणों की प्राप्ति होती है। उन गुणों के प्राप्त होने से स्वार्थ राग द्वेष अविद्या काम क्रोध लोभ अभिमान आदि सारे दोष धीरे धीरे कम होते जाते हैं, और अंत में समाप्त हो जाते हैं, तभी उसका मन शुद्ध होता है। और फिर वह वास्तविक सत्य को समझ पाता है। उस सत्य को धारण करने से उस व्यक्ति का कल्याण हो जाता है।
         मन की शुद्धि के लिए, ईश्वर उपासना के अतिरिक्त इस जैसा और कोई उत्तम उपाय नहीं है, कुछ सहयोगी उपाय तो हैं। इसके साथ साथ वेदों का अध्ययन गुरुजनों के आदेश निर्देश का पालन करना, ये भी सहयोगी उपाय हैं। मन की शुद्धि के लिए, इन उपायों का भी लाभ लेना चाहिए।
- स्वामी विवेकानंद परिव्राजक 

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